Paramhans_Shrirambabajee: बीज की बीज फिर तक की यात्रा अहंकार के पत्थर पर नहीं मृदु मृदा में संभव है

बरुण सखाजी श्रीवास्तव बीज पत्थर पर पड़ा रहे तो उसे कितना ही खाद-पानी मिले, वह बिना मिट्टी के विकसित नहीं होगा। फूल सकता है, फूलकर फट सकता है। उसमें संसारी भ्रम के लिए अंकुरण हो सकता है, संपूर्ण यात्रा के…








