परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी श्रृंखलाः आलेख-7
बरुण सखाजी श्रीवास्तव
परहित बस जिनके मन माहीं, तिनको जग दुर्लभ कछु नाहीं। परमहंस श्रीराम बाबाजी अक्सर गाया करते थे। वे सशरीर इस संसार में हनुमानजी के रूप में विराजमान रहे। परहित की कल्पना नहीं बल्कि मूर्त स्वरूप उनकी क्रियाओं में था। निरंतर, सदा सबका अच्छा करने वाले। सबका हित करने वाले। कभी खुद के लिए एक झोली तक की अपेक्षा, मांग, विचार, चयन भी नहीं करते थे। भाना और न भाना उनके शब्दकोष में नहीं था, लेकिन दूसरों को क्या भाएगा और क्या सही रहेगा, इसकी पूरी कोशिश होती। सदा दूसरों के हित की सोचने वाले ईश्वर ही तो होते हैं। इन्हें हम और कस्टमाइज करेंगे तो वे अवतारों, चरित्रों में मिल जाएंगे।
दूसरों के लिए होने का कॉन्सेप्ट सिर्फ भारतीय दर्शन में पाया जाता है। बाकियों में यह गिव एंड टेक के रूप में है। अच्छा करोगे तो अच्छा पाओगे। हमारे यहां अच्छा करोगे तो अच्छा होगा, पाना-खोना अलग बात है। भारतीय दर्शन में यह सोच निस्वार्थ भाव के साथ समाहित है। परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी कौओं, कुत्तों, गायों, मछलियों और बंदरों समेत सभी जीवों में चैतन्य ब्रह्म देखते थे। परमहंस श्रीराम बाबाजी मानते थे, गाय की टहल यही है कि हम इसके दर्शन करें, भोजन दें और पालें। पाल न सकें तो भोजन तो जरूर दें। बंदरों से वे बहुत करीब महसूस करते थे। एक यात्रा में मैं पीछे बैठा था। रास्ते में जंगल के दौरान बंदरों को आम दिए जा रहे थे। गाड़ी रुकी, बंदरों के झुंड के झुंड गाड़ी पर चढ़ गए। महाराज जी ने थोड़ा सा कांच खोला और एक बंदर के हाथ में आम दिया। बंदर लेकर पेड़ पर जा बैठा। पूरे आनंद के साथ वह आम खाने लगा। महाराजजी ने यह क्रिया देखकर कहा, आदमों से अच्छे बंदरा हैं। एक मिनट पहले उन्हें पता नई थो आम मिल है और एक मिनट बाद भी पता नै रै है आम मिल है का कछु और का फिर कछुए नै मिल है। बे चिपके हैं डार पे। नै पानी की चिंता, नै खाबे की, नै रहबे की। जोई तो भरोसो है। आदमी हे देखो पीढ़ियों को इंतजाम धरे बैठो है तो भी मरो जा रौ। जो नईयां बो नइयां। इतना एक फ्लो में बोलकर वे मौन हो गए। मेरे मन में चिंतन शुरू हुआ। सच में हनुमानजी कितने व्यापक और जेनेरिक तरीके से सोचते हैं। बंदरों में हमे एक जंगली जीव दिखाई देता है जिसकी अपनी यही मौलिकता है। किंतु इसे दर्शन से जोड़ना हमारे लिए असंभव है। हमने अगर जोड़ा भी तो हर बंदर को हनुमानजी समझ लिया। महाराज जी ने अपना मौन तोड़ा और बोले, आंखों के अंधे, कानों के बहरे, चुप रै बाबा कुछ मत कह रे। और कार के डैशबोर्ड पर हाथ पटकते हुए गाड़ी को आगे बढ़ाने का इशारा किया।
जब हम सनानत के वांग्मय को देखते हैं तो सबसे अद्भुत विराट स्वरूप माना गया है। इसके अलावा शंकर की बारात के कॉन्सेप्ट भी हमारी फिलॉस्फी में हैं। इसका अर्थ सबमें वही है। जड़ में भी और जिंदा में भी। परमहंस श्रीराम बाबाजी यही करते थे। हमारे आख्यानों में जिक्र है पेड़ों से बात करने का, पहाड़ों से बात करने का, राम जी के सामने तो समुद्र ही मनुष्य शरीर धारण करके प्रकट हो गया था। गिद्ध रावण से लड़ते हैं। बंदर सेना में शामिल होकर युद्ध करते हैं। दो पक्षी राम की कथा कहते हैं। परमहंस श्रीराम बाबाजी की यह क्रियाएं विधात्री क्रियाएं हैं। राम समुद्र से बात करते हैं, श्रीराम बाबाजी गायों से रास्ता पूछते हैं। राम खग, मृग, मधुकर, श्रेनियों, लताओं से सीता का पता पूछते हैं, परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी पहाड़ की चट्टानों में सिंदूर लगाकर हनुमानजी मानकर पूजा कर देते हैं। इधर-उधर से समेटकर लाए कपड़े के टुकड़ों को इकट्ठा करके हवन करवा देते हैं। जैसे साईंखेड़ा वाले दादाजी धूनी वाले करवाते थे। वे शंकर के अवतार थे ही। यह सब विधात्री क्रियाएं होती हैं। इसलिए परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी चैतन्य हनुमानजी थे और अब वे चेतनाओं में सूक्ष्म रूप में विराजमान हनुमानजी हैं। बस अनुभव करके देख लीजिए।

- (आलेख– 8 में पढ़िए अवतार योग)
- आलेख-1 ईश्वर की परिभाषा
- आलेख-2 ईश्वर तत्व
- आलेख-3 ईश्वरीय योग
- आलेख-4 परमतत्व की साधना
- आलेख-5 परमेश्वर का जीवंत बिंब
- आलेख-6 विधाता का संवाद
- आलेख-7 विधात्री क्रियाएं
- आलेख-8 अवतार योग
- आलेख-9 आख्यानों में दर्ज गुरु तत्व
- आलेख-10 गुरु में ईश्वर का दर्शन
- आलेख-11 बिंब से प्रकट चैतन्य दृश्यमान प्राकट्य
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