बरुण सखाजी श्रीवास्तव
चमत्कार हमारे मन का सबसे मजबूत और बड़ा आग्रह है। चमत्कार के बिना न आस्था जागती है न विश्वास स्थापित होता है। चमत्कारों में जीने वाले असल में नास्तिकता से भरे होते हैं। जैसे अक्सर नॉनबिलीवर्स यानि नास्तिक कहा करते हैं, अगर वह इतना करुणानिधान है तो अस्पताल क्यों हैं, आपदाएं क्यों हैं, संकट क्यों हैं? दरअसल यह सोच का ऐसा सांचा है जो बहुत कच्ची बातें समझा सकता है। प्रकृति और सनातन दोनों ही विराट में यकीन करते हैं, संकुचितता में नहीं। इन दोनों के बीच में अवरोध बनकर खड़े होने की कोशिश करते हैं चमत्कारवादी यानी नास्तिक यानी आग्रही।
महाराजजी परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी ने कभी डंका बजाने के लिए कुछ किया ही नहीं। वे तो डंकों से दूर भागते रहे। जहां, जब, जैसे शरीर को सुख मिला उन्होंने तत्क्षण त्यागा। जहां, जब, जैसे भी चमत्कारवादियों का हुजूम जुड़ा वे वहां से भागे। इस चर्चा के बीच भी यही होना था। कायाकल्प की बातें होती रही, वे शरीर को न जीवन में साधते थे न देहत्याग के वक्त। उन्हें अपने कायाकल्पी होने की न तब पड़ी थी न अब, जबकि वे ऐसा एक पल में कर सकते थे।
परमहंस श्रीराम बाबाजी सशरीर हनुमानजी के समान आठों सिद्धियों, नौ निधियों के स्वामी थे। इसके बाद भी किसी चमत्कार का न दावा न ऐसे लोगों के सामने खुद को सिद्ध करने की कोशिश। गुरुवर परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी अपने नश्वर शरीर के छूटने से पूर्व बनारस में विराजमान थे। शरीर छोड़ने से पहले 72 दिनों तक उन्होंने एक अन्न का दाना मुंह में नहीं लिया था। न कोई तरल ही लिया था। पानी भी चंद बूंदें पीई थी। इस दौरान आम चर्चा में यह बात आरंभ हो गई कि गुरुवर कायाकल्प कर रहे हैं, चूंकि उनके शरीर पर आए रोग के चिन्ह ढंकने लगे थे। भगवन ने जब काशी विश्वनाथ मंदिर की यात्रा की तो कायाकल्प को लेकर लोगों का विश्वास और भी मजबूत हुआ। इस बात की जानकारी लगी तो प्रसन्नता किसे न होती। लोगों को लगने लगा महाराजजी सच में कायाकल्प कर रहे हैं तो चमत्कार प्रेमियों के लिए यह बड़ी बात थी। चमत्कारवादियों में से अनेकों ने कहना शुरू कर दिया, चमत्कार हो गया है, अगर कायाकल्प हो गया तो समझो क्षेत्रभर में डंका बज जाएगा। बस इस बात का प्रचार होना ही था कि उन्होंने सारी क्रियाएं थाम दी।
आगे उनकी ही कृपा से और समझ उत्पन्न हुई तो समझ आया कायाकल्पी देवरहा बाबाजी हुए, तैलंग स्वामी हुए। परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी संसार में हुए सभी संतों का समिश्रण हैं। उनकी कायाकल्पी क्रिया देवरहा बाबाजी की, तो देहत्याग के समय पूर्ण धड़ंग होने की क्रिया तैलंग स्वामी की रही। चिंदियों, कागजों को जलाकर यज्ञ की क्रिया दादाजी धूनीवालों के समान रही। मंडला बकछेरादोना आश्रम में झूले पर बैठकर पांव में पायल, सिर पर चुनरी डालकर नर्मदा का स्वरूप दिखाना स्वामी रामकृष्ण परमहंस की तरह क्रिया दिखी तो नाभि से निरंतर श्रीराम जय राम जय जय राम का अजपा नींब करौली बाबा का स्वरूप बना। हम अल्पसमझ वालों को अभी तक यह नहीं समझ आया कि परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी हमे चैतन्य समग्र स्वरूपों में भौतिक दर्शन देकर चले गए। अब वे हैं, किंतु भौतिक में नहीं पारलौकिक में। किंतु आपके चमत्कार के लिए वे न अनुभूत होंगे न प्रकट। पमरहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी के निर्मल दर्शन बिना चमत्कार की अपेक्षा के ही संभव हैं।


