परमहंसियों का चयन समझना कठिन है, गुड्डा बाबा और हनुमान अंश में बहेलिए की तुलना करके दिखिए

बरुण सखाजी श्रीवास्तव

फिल्म हनुमान अंश में नीब करोरी बाबाजी अपनी सेवा के लिए एक बहेलिया का चुनाव करते हैं। बहेलिया मतलब चिड़ियों को पकड़कर मारने वाला। इन्हें बेचकर अपना जीवन चलाने वाला। कितनी अजीब बात है। एक तरफ हनुमान अवस्था को प्राप्त प्रकाशित नीब करोरी बाबाजी दूसरी तरफ एक हिंसक, निर्जीव, मूक, असहाय उन्मुक्त प्राणियों को दबोचकर खा जाने वाला बहेलिया। वास्तव में परमहंसों की कई क्रियाएं हमारे इस कूढ़मगज में समाती नहीं हैं। इनका चयन बड़ा अटपटा होता है। इनकी परख अपनी होती है। इनकी दृष्टि सारे बंधन, परदों को भेदने वाली होती है। इनका नजरिया व्यापक होता है। जन्म-जन्मांतर की यात्रा होती है।

बहेलिया इकलौता ऐसा व्यक्ति है जिसे नीब करोरी बाबाजी चैतन्य शिव के रूप में दर्शन देते हैं। साधुओं, संतों को मौंखिक, भौतिक रूप से शिवजी कहना अलग बात है। उन्हें महसूस करना अलग बात है। बहेलिया गोपाल आनंद में उस स्थिति को प्राप्त हो गया जो रामजी के दर्शन करके सुतीक्षण मुनि को प्राप्त हुई थी। वह आनंद से भर जाता है। भौतिक शरीर को बुखार आ जाता है। बहेलिया सीधा है, सरल है। साधारण संसार बाहर दिख रही हिंसा को देख पाएगा, किंतु परमहंस भीतर समाए सत्य को देखते हैं। इसीलिए सारे पर्दों को भेदने वाले ही परमहंस होते हैं।

नीब करोरी बाबाजी का एक संवाद प्रकट होता है। बहेलिया गोपाल निशंक हैं। वे मानते हैं जिनके दर्शन हुए वे बाबा नीब करोरी हैं। वे ही शंकर हैं। किंतु बहेलिया सरल है। सहज है। ज्यों हमारे गुड्डा बाबा। वह प्रश्न करता है, महाराजजी हमने गुफा में जो देखो। महाराजजी नीब करोरी बाबा मुस्कुराते हैं और कहते हैं आंखें वही देखती हैं जो मन में होता है और तुम्हारे मन में शिव हैं। जरा सोचिए, कथा हनुमानजी की चल रही है और प्रकट शिव हो रहे हैं, क्यों? इस क्यों को ही समझने की जरूरत है। क्योंकि शिव ही सहज है। भोला है। सरल है। शंकर है। कण-कण है। वही हनुमान है। वही रुद्र है। परमहंस श्रीराम बाबाजी चैतन्य हनुमानजी हैं। वे ही ग्यारहवें रुद्र हैं। वे चैतन्य देव हैं।

जैसे बाबा नीब करोरी ने बहेलिया को चुना। वैसे ही परमहंस श्रीराम बाबाजी ने गुड्डा बाबा को चुना। गुड्डा बाबा में सेवा, सहजता और सरलता प्रचुरता में है। बंसल अस्पताल में थे भगवान। स्वयं भौतिक पीड़ा में थे, किंतु चिंता गुड्डा बाबा की थी। गुड्डा बाबा को बहेलिया की तरह कैसे दर्शन हुए यह तो किसी को नहीं पता, न किसी को वे बता पाते क्योंकि सरल हैं। सहज हैं। मूल हैं। मेरी या आपकी तरह नहीं अपने ही किस्से सुनाते फिरें, अपना ही भाव बताते फिरें, अपनी ही महिमा महाराजजी के किस्सों के साथ जोड़कर प्रचारित करते फिरें। महाराजजी का चयन परमहंसी है। हमे लगेगा इनका चयन इसके लिए क्यों, कैसे, किसलिए इत्यादि, क्योंकि हम संसार के नजरिए से देखते हैं। परमहंसी का दृष्टिकोण व्यापक, अनंत यात्राओं से विकसित होता है। परमहंस श्रीराम बाबाजी का गुड्डा बाबा का चयन समझना बड़ा जटिल है, क्योंकि हमारे मापदंड बहुत संकुचित, एकाध जन्म तक सिमटे, एकाध घटना के दायरे में बंधे, एकाध सीमा में गुथे होते हैं। व्यापक नहीं।

बंसल अस्पताल में परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी गुड्डा बाबा की सेवा से ऐसे प्रसन्न हुए कि उन्हें अपना पुत्र कह दिया। एक बार नहीं अनेक बार बोले, ऐसी सेवा बेटा भी नहीं कर सके। मो से बेटा ही निकलो। परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी के देह तजने के इस दूसरे वर्ष-दिवस में आज यह किस्सा सहज ही ख्याल में आया।

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