ParamhansShrirambabajee: ईश्वर सिर्फ मनुष्य जैसा नहीं होता, विविध जीवों, निर्जीवों में भी है, इस दिशा से ही विधाता से संवाद संभव

बरुण सखाजी श्रीवास्तव

सोहम की स्थिति में सामान्य देह में साक्षात ब्रह्म विराजता है। यह हमारे सारे ग्रंथ कहते हैं। आध्यात्मिक जितने भी शोध हुए हैं वे सब बताते हैं अहम ब्रह्मास्मि एक स्थिति होती है। आकार या निराकार में खोजते हुए हम कई बार भटक जाते हैं, लेकिन आत्म-ब्रह्ममय हो जाने में भटकाव नहीं होता। यह होना अपनी कोई घोषणा नहीं होती, न ही कोई कर्म प्रयास, यह एक स्थिति है। इस स्थिति में पहुंचने के लिए कई सारे पायदान हैं।

परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी गायों, कुत्तों, कौओं से बात कर लेते थे। कई बार तो वे पेड़ों से संवाद करते थे। इस सूक्ष्म संवाद को अनुभव करना पड़ता था। कभी यह वाणी से भी होता था, किंतु अधिकतर यह उनकी अपनी शैली में हुआ करता था। यहां तक कि निर्जीव धूनी से भी बात करते थे। अपनी यात्राओं में जुटे नारियल, सूखे पत्ते, लकड़ी के कुछ टुकड़े धूनी में डालते हुए बोलते थे, लो, और लेओ, लेओ और लेओ। अनेक बार तो वे धूनी को अप्रत्यक्ष ही प्रकट कर देते थे। जैसे किसी भक्त के यहां हैं और कई सारी चिंदियां यानी कपड़े के टुकड़े इकट्ठा किए और आग लगाने को बोल देते। फिर कहते भूखी हती भौत दिनों की। जब सामान्य देह सोहम की अवस्था में हो तो वह निर्जीवों, सजीवों में भेद नहीं करती। 64 कलाओं से युक्त परमब्रह्म निर्भेद है। पेड़ों से भी उसी धुन में बात होगी, जानवरों से भी और मनुष्यों से भी। इस बीच जिज्ञासा जन्म लेती है कि अगर संवाद हो रहा है तो जिससे संवाद हो रहा है उसकी प्रतिक्रिया क्यों नहीं होती वैसी? इस जिज्ञासा का समुचित उत्तर यही है कि हम वह प्रतिक्रिया देख, सुनने, समझने के योग्य नहीं होते। परमब्रह्म कंकड़ से भी संवाद कर लेते हैं। उन्हें इसके लिए वाणी, जिव्हा, स्वर, विचार, शब्द, वाक्य की आवश्यकता नहीं होती। वे आत्म संवाद करते हैं और आत्म-परमात्म से कनेक्ट है। तब टेलीफोन एक्सचेंज की तरह किसी एक्सचेंजर की जरूरत ही खत्म हो जाती है।

गुरुवर हनुमानजी श्रीराम बाबाजी के परम सेवक और भक्त शिरोमणि राजकुमार पाराशर एक घटना का जिक्र करते हैं। वे बताते हैं, एक बार भगवान किसी के यहां से ढाल लेकर आए। ढाल बांस के ऊपर छींदे के पेड़ के समान मोरपंख की सजावट से बनी होती है। इस ढाल को भगवान ने अपनी कार में यूं रखा कि उसका एक बड़ा हिस्सा बाहर निकला था। ड्रायविंग सीट पर बैठे पाराशर देख रहे थे, महाराजजी कुछ संवाद कर रहे हैं। कभी बुदबुदाते हुए कहते, भौत परेशान कर रहे थे, अब देखो हम तुम्हें मुक्ति दें, इत्ती दूर छोड़ हैं कि आ नै पा हो। भक्त महात्मा पाराशर को समझ आया कि उस ढाल के जरिए कुछ ऐसी पारलौकिक आत्माएं उस गांव और परिवार पर प्रतिकूल असर डाल रही थी जहां यह ढाल थी। महाराज जी ने अपने संवाद में उनसे कहा, एक बार समझाया था नहीं माने अब चलो।

इस किस्से से पता चलता है भगवान श्रीराम बाबाजी का अपना संवाद का तरीका था। वे हर कण से संवाद स्थापित कर सकते थे। तभी तो इस विकट भौतिक अहंकार केंद्रित संसार से कभी निकट नहीं रहे। आए, गए, चले गए, जो था वो छोड़ा, जो नहीं था वो ओढ़ा, कोई समझा, कोई समझा नहीं, इन सबकी परवाह किए बिना यात्रा आरंभ।

विधाता से संवाद आग्रहों से मुक्त होकर ही संभव है। जब हम मानते हैं ईश्वर सिर्फ मनुष्य के लिए है तो हम बहुत संकुचित सोचते हैं। भारत में अधिकतर प्राचीन हनुमानीजी की मूर्तियां अपूर्ण स्वरूप में होती हैं। कई जगह सिर्फ एक पत्थर है, जिसमें कुछ ऊबड़खाबड़ उभरा है, कई जगह कुछ और। कहीं दूर न जाइए छींद में हनुमानजी को देखिए। छींद से भी अधिक शक्तिशाली उदयपुरा तलापुरा वाले हनुमानजी को देखिए। साफ, सुथरा एकदम समझ आने वाला स्वरूप नहीं होता। इसका अर्थ है ईश्वर सर्वत्र और सबका है। वह सिर्फ मनुष्यों का नहीं। जिन धर्म में ईश्वर को सिर्फ मनुष्य का रूप ही दिया गया है वे अधूरे हैं। संपूर्ण सनातन ही है। इसमें कछुआ, मछली, सुअर, नाग भी ब्रह्म हो सकते हैं। मनुष्य तो हो ही सकता है। परमहंस श्रीराम बाबाजी उस ब्रह्म को मछलियों, कौओं, कुत्तों, गायों, बंदरों में देखते थे। इसलिए वे स्वयं ब्रह्म हुए। क्योंकि चौसठ कलाओं से परिपूर्ण ब्रह्म ही विस्तार है। जैसे विराट स्वरूप। इन सब बातों को सही दिशा में समझें तो हनुमानजी परमहंस श्रीराम बाबाजी सामान्य मनुष्य देह में चैतन्य हनुमानजी ही थे।

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  • आलेख-1 ईश्वर की परिभाषा
  • आलेख-2 ईश्वर तत्व
  • आलेख-3 ईश्वरीय योग
  • आलेख-4 परमतत्व की साधना
  • आलेख-5 परमेश्वर का जीवंत बिंब
  • आलेख-6 विधाता का संवाद
  • आलेख-7 विधात्री क्रियाएं
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  • आलेख-9 आख्यानों में दर्ज गुरु तत्व
  • आलेख-10 गुरु में ईश्वर का दर्शन
  • आलेख-11 बिंब से प्रकट चैतन्य दृश्यमान प्राकट्य

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