परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी श्रृंखलाः आलेख-3
बरुण सखाजी श्रीवास्तव
परमहंस गुरुवर हनुमानजी अक्सर गाया करते थे, जो यही भांत बने संजोगा। अपने आंतरिक कीर्तन के साथ ही वे कई बार खंजरी लेकर बाह्य कीर्तन में भी जुट जाते थे। ईश्वरीय योग से आशय एक ऐसे संयोग की बात है जो हमे पता नहीं होता, किंतु बन जाता है। जैसे महाराज जी गुरुवर हनुमानजी श्रीराम बाबाजी जब कहीं विराजते तो कई बार कीर्तन करने लगते। इस दौरान कुछ ऐसे लोग भी जुट जाते थे जो अलग-अलग ढंग से इस संयोग की अभिलाषा मन में लिए पहुंचे होते। तब महाराज जी कहते, जो यही भांत बनें संजोगा। एक साधारण देह में परमतत्व के आने की क्रिया में सामान्य देह में भीतर तक उस परमतत्व की खोज का तीव्र आवेग होना चाहिए। वैसे तो परिभाषा बहुत दूरूह भी है और सरल भी, किंतु अनेक बार ऐसी परिभाषाओं को निर्धारित करके आगे बढ़ना होता है। दूसरे पायदान पर ईश्वरीय तत्व को आंतरिकता से समझना होता है। तीसरे क्रम में ईश्वरीय योग का महत्व है।
ईश्वरीय योग और संयोग के लिए भीतरी मनन बड़ा आवश्यक है। ईश्वर को पाना या उसके हो जाना या वही स्वयं हो जाना संसार में साइड वर्क नहीं है। जैसे संसार में तमाम दिन-रात के कामों से मिले वक्त में किए गए चिंतन से यह योग नहीं बन सकता। इसके लिए तड़प, भीतर तक भिगी हुई भक्ति की महक और निरंतर चलने वाली तात्विक लक्ष्यता का होना जरूरी है। जो इस संजोग को अनंत से जोड़कर देखता है वह ईश्वर है। ईश्वर हो जाने जैसा है। बशर्ते वह संसार में न हो। संसार में न होने का अर्थ झोला उठाकर निकला हुआ नहीं होता। संसार में न होना मतलब निर्मल हर चरणों में होना है। सदा हर कार्य उसे समर्पित करके करते रहना है। किंतु कपटपूर्वक नहीं। हर कार्य का अर्थ है सहजता से, जरा भी दिमाग लगा या बुद्धि घुसी, बस सारा खेल बिगड़ा।
ऐसा होता था कि हनुमानजी श्रीराम बाबाजी सदा ही ऐसे मानस में रहते थे। वे सतत उस राम पर भरोसा रखते थे जो चिन्मय है। जिसकी कोई कभी व्याख्या नहीं कर सकता। जब एक सामान्य देह में विराजमान परमेश्वर के अंश को इश्वरीय योग की अच्छी समझ हो जाती है तो वह खुद ही से इसकी साधना और उपसाना में जुट जाता है। साधनाएं, उपासनाएं अनेक तरह की हो सकती हैं। हमे लगता है साधना जो दिखाई दे, उपासना जो समझ आए, किंतु ऐसा नहीं है। परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी चिर-साधना में रहते थे। क्योंकि वे जरा भी दुविधा में नहीं थे। न किसी असमंजस में।

परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी ऐसी कई लीलाएं किया करते थे जिनसे लोग भ्रमित हों। वे चाहते थे लोग उनके इतने पास न आएं कि उनकी साधना में खलल पड़े। इसलिए वे कई बार महीनों सबसे दूर कहीं अज्ञातवास पर चले जाते ते। परमहंस श्रीराम बाबाजी किसी परंपरा के अधीन नहीं रहे। उन्होंने अपनी लीक और लाइन बनाए रखी। इसका परिणाम ये हुआ कि उनसे कई लीक पर चलने वाले लोगों को अविश्वास उत्पन्न हुआ। लोगों को लगा ऐसा कैसे हो सकता है। दरअसल वे स्वयं नहीं चाहते थे कि कोई उनकी इतनी छाया में रहे कि मूल स्रोत तक पहुंच पाए। वे अपरंपारी अनंत आनंदी लीक पर चलने वाले सदा लीलालीन रहे।
एक बार वर्ष 2019 में अचानक से मेरे मुंह से निकला जाने भगवान की क्या माया है। क्या होने वाला है। क्या होगा और कैसा होगा। पता नहीं भगवान वैसा है भी या नहीं जैसा हम पूज रहे हैं। महाराजजी बिलासपुर में विराजमान थे। उन्होंने परम विश्वास के साथ कहा। है, है, है और जैसा है वैसा ही है, जैसा हो वैसा ही है। तुमरे ऊपर है। जैसा मानो। इस वाक्य ने बड़ा प्रभाव दिखाया। जिस तरह की उधेड़-बुन चलती थी। एक संसारी शरीर में उसमें मैं अधोपतित मनुष्य इस वाक्य के बाद संभला महसूस करता हूं। सत्य है उनकी इस वाणी ने ईश्वर के प्रति सदा-सदा के लिए भाव ला दिया। उस दिन से अभी तक कभी एक बार भी इस विषय पर असमंजस नहीं आया।
ईश्वरीय योग ऐसे बनने लग जाते हैं, जब हमारे भीतर का एकसूत्रीय विचार चल पड़ता है। हर वक्त, हर जगह सिर्फ और सिर्फ आनंद ही होता है। परमहंस श्रीराम बाबाजी कभी आनंद के अलावा किसी दूसरी स्थिति को न देखते थे, न होती थी, न वे मानते थे। दुविधामुक्ति, निरंतर हरि सुमिरन ही असल में ईश्वरीय योग है। यही अंश को परमहंस तक लेकर जाता है। परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी इसी अवस्था में सदा रहे।
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(आलेख–4 में परमतत्व की साधना)
आलेख-1 ईश्वर की परिभाषा
आलेख-2 ईश्वर तत्व
आलेख-3 ईश्वरीय योग
आलेख-4 परमतत्व की साधना
आलेख-5 परमेश्वर का जीवंत बिंब
आलेख-6 विधाता का संवाद
आलेख-7 विधात्री क्रियाएं
आलेख-8 अवतार योग
आलेख-9 आख्यानों में दर्ज गुरु तत्व
आलेख-10 गुरु में ईश्वर का दर्शन
आलेख-11 बिंब से प्रकट चैतन्य दृश्यमान प्राकट्य
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