बरुण सखाजी श्रीवास्तव
अध्यात्म बारीक विषय है। इतना सूक्ष्म कि सूक्ष्म में गोता लगाने वाले भी न खोज पाएं। ज्यों नाम की लालसा। हम कुछ करें या न करें, पर नाम हो। कुछ करें तो नाम न हो ऐसा तो कोई विरला ही सोच पाता होगा। किसने किया, सबको पता हो, किसके कारण हुआ, सबको पता हो, किस प्रकार हुआ, सबको पता हो। यही चाहतें हमे नामदार बना देती हैं। नामदार बनाने का अर्थ, ऐसा बनाना जो अरमानों, चाहतों, हासिलों, खोने, अच्छे और बुरे में अत्यधिक फंसा हो। मैंने यह किया का भाव ही अंहकार है, किंतु मैंने यह नहीं किया भी अहंकार ही है। तब मैं यानी नाम से बड़ा अहंकार तो क्रियात्मक होना चाहिए। क्रियात्मकता ही अहंकार है। इसे पकड़ना कठिन है। अब तो विद्वानों में यह भी चर्चा होने लगी कि मूल अहंकार को त्यागना संभव नहीं। यह चर्चा दरअसल बुद्धि करती है, विवेक नहीं। बुद्धि जब अहंकार को नही परास्त कर पाती तब वह इस तरह के कुतर्क गढ़ने लगती है।

अहंकार की इस जटिलता को खत्म करना हम जैसे कूढ़मगज के बसका नहीं। किंतु रामकृपा हो जाए तो पलभर में अहम का नाश हो जाता है। क्रियात्मकता से जन्मे अहम को क्रियात्मकता से ही नष्ट किया जा सकता है। यह क्रिया इतनी सुधी, सुलझी और शोधित होनी चाहिए कि अहंकार नाश की क्रियात्मकता ही हमे कहीं न जकड़ ले। कोटि-कोटि ब्रह्मांडों में दो तत्व ब्रह्मचर्य और अंहकारमुक्ति दुर्लभ हैं। यह दोनों ही हनुमानजी में हैं। हनुमानजी इकलौते ऐसे पात्र हैं जिन्हें कभी अहंकार छू न सका। जिन्हें अहंकार छू न सके वही तो हनुमानजी होते हैं। इसलिए ही परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी हैं। रामजी ने हनुमानजी की अनेक बार परीक्षा ली, वे हर बार अहंकार से मुक्त मिले। लेकिन जब रामजी ने फंसा ही लिया तो हनुमानजी ने कहा…
कह हनुमंत बिपती प्रभु सोई, जब तव सुमिरन भजन न होई।।
परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी इस अहंकार के समग्र निदान का क्रियात्मक और विचारात्मक निदान बताते हैं। वे बताते हैं अहंकार मुझे नहीं व्याप्ता सोचना भी अहंकार है। इससे कैसे बचा जाए। अनाभिव्यक्त परमहंस श्रीराम बाबाजी यूं तो कोई वाक्यों में, संदर्भों में कोई उपदेशों में अपनी बात नहीं कहते। वे समझाते हैं। करके दिखाते हैं। इंटरप्रिटेशन आपके अपने ऊपर छोड़ देते हैं। इसलिए ही किसी को वे साधारण संतजी लगते हैं, तो किसी को महात्माजी, किसी को बाबाजी, तो किसी को क्षेत्र के बड़ा साधू। किंतु वे हैं मूलतः हनुमानजी। लोगों को अनेक बार ऐसा अवसर मिला वे उनके बचपन, तपस्याकाल के बारे में जानें, लेकिन महाराजजी थोड़े ही प्रकट होते और फिर मौन। किसी को भी कितना ही पता है तो चंद घटनाएं, विस्तार नहीं। इतने विराट जीवन में क्या चंद घटनाएं भर होंगी, कतई नहीं। घटनाओं से भरा है जीवन। मगर हनुमानजी ने कभी अपने आपको वैसे प्रकट नहीं किया और न ही कभी ऐसे अप्रकट रखा। क्योंकि न प्रकट करना भी अहंकार बन सकता है। इसलिए प्रकट, किंतु सीमित। परमहंस श्रीराम बाबाजी क्रियात्मक रूप से अहंकार के निषेध की बात करते थे। न तो यह मानो तुम हो, न ये मानो तुम नहीं हो, न ये मानो तुम अहंकारमुक्त हो न ये मानो अहंकार से युक्त हो। जब जहां जय हो वहां से जाओ, जब जहां नाम हो वहां से उठो, जब जहां जैसे फूल हों, तारीफें हों, अच्छा हो, या बुरा ही क्यों न हो वहां से अनासक्त होकर निकल जाना चाहिए। इसीलिए महाराजजी एक जगह न रुकते थे न अभी रुके हुए हैं। वे अब भी गतिमान हैं।
नाम, ख्याति, कीर्ति, पुष्प, प्रशंसा से अहंकार बलवान होता है, किंतु अख्याति, अकीर्ति, कांटे, आलोचना, बदनाम से अहंकार जन्म लेता है। हमे अहंकार के नाश के लिए अहंकार नहीं होने के भाव से बचना होता है। भक्ति का, शक्ति का, रिक्ति का, अनुरिक्ति का, वैराग्य का, अनुराग का, आनंद का, मुक्त का, युक्त का सबका अहंकार होता है। अहंकार से मुक्ति का ढंग एक ही है, इससे न दूर रहा जाए न अपनाया जाए। अहंकार मुझ जैसे एक दुर्बल बुद्धिमान की तरह होता है, जो जरा सी उपेक्षा से विचलित हो जाता है। जिसके लिए कोना पकड़ना मुश्किल होता है।
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