परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी श्रृंखलाः आलेख-5
बरुण सखाजी श्रीवास्तव
जब मन, वचन, कर्म से मनुष्य एक हो जाता है, तब उसमें ईश्वरीय बिंब प्रकट हो जाता है। परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी एक पल के करोड़वें हिस्से में भी किसी दुविधा में नहीं रहे। वे बेधड़क बोलने में, करने में, करवाने में चूके नहीं। जो ठीक लगा तो बहुत तारीफ नहीं, जो खराब लगा तो बहुत बुरा नहीं। उनके मुख से कभी पश्चाताप सूचक शब्द या भाव प्रकट नहीं होते थे। रास्ता भटक गए, कहीं जाना था कहीं और निकल गए, मगर ऐसा नहीं कि ऐसा था तो वैसा क्यों हुआ और वैसा था तो ऐसा क्यों हुआ। वे ईश्वरीय विधान में अपना कोई अभिमत नहीं देते थे। यानी पूर्ण विश्वास के साथ यह मान लेना कि अस्तित्व के हम एक हिस्से हैं। हर समय यह जानते रहना कि जो होगा वही होना था और वही होगा।
जो होना था वही होगा, वही होगा और वही होकर रहेगा। ये वाक्य संसारियों को भ्रमित कर सकता है, किंतु साधुत्व में इसका विराट अर्थ है। इसका संसार में अर्थ अपनी अकर्मण्यता को तर्क से ढंकने के लिए इस्तेमाल होता है, किंतु अध्यात्म में यह निश्चिंतता का अद्वैत तत्व है। परमहंस श्रीराम बाबाजी अपनी कई क्रियाओं से इसका संदेश देते थे। एक यात्रा में सिलवानी से शियरमऊ की ओर घाटी जैसे ही हम चढ़े तो मैंने कहा महाराज जी यहां रास्ते में दीवान बाबा का स्थान पड़ेगा। वह स्थान मेरे इस शरीर के कुलवंश का कुलदेव स्थान है। पहले उन्होंने अनसुना किया। जब मैंने अहंकार के वशीभूत फिर से इस तथ्य को उनके सामने रखा तो उन्होंने एक वाक्य में कहा, जे तो बैठे हैं सब। कुलदेवता, मुलदेवता। उस दिन से मैं कभी दोबारा न उस तरफ गया न सोचा न विचारा। क्योंकि साक्षात चैतन्य ईश्वर बिंब ने हमसे कह दिया, हम ही हैं वो और वो ही हैं हम तो हम क्यों भटकें।
इस भटकाव पर विराम जरूरी है। परमेश्वर का जीवंत बिंब सतत साथ में है हम महज एक साधू मानकर साथ रहें तो यह एक लोक व्यवहार से ज्यादा कुछ भी नहीं। परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी लोक व्यवहार को संसार का एक संवाद सेतु तो मानते थे, किंतु यकीन उनका नहीं था। न वे कभी ऐसा दर्शाते थे। उनका भीतरी आनंद निर्मल, निश्छल और निरंतर होने में था। थमने में नहीं। थामने में नहीं। रुकने में नहीं रोकने में नहीं। सदा ही गतिज उनका मार्ग था।

परमेश्वर के बिंब के रूप में एक बार और ऐसी घटना घटी। महाराजजी छतवाले कुएं पर परमभक्त ओमप्रकाशजी के निवास पर थे। मैं ओमप्रकाशजी का परम आभारी हूं, क्योंकि हनुमानजी परमहंस श्रीराम बाबाजी के दर्शन उन्होंने ही मुझे करवाए। मैं महाराजजी को देख तो रहा था वर्षों से, लेकिन दर्शन उनके कारण ही हुए। इसलिए उनके आभार के लिए मेरे पास कोई न शब्द हैं न भाव। मेरे आध्यात्मिक जीवन का यह दर्शन महाद्वार बना। महाराजजी जब नीचे आए तो सामने से निकलते हुए सांड को देखकर कहा, लाओ इनके लिए कुछ लाओ। तत्काल रोटियां लाई गईं। तभी कुत्ते भी आ गए, महाराजजी बोले, अच्छा तुम भी आ गए। अब इन्हें भी कुछ लाओ। फिर रोटियां दी गईं। तभी किसी भक्त ने कहा महाराजजी विराजते रात ज्यादा हो रही है। तो महाराजजी बोले सड़क, सांड, सन्यासी इन्हें कोई नहीं रोक सकता। इस घटना से विचारों ने जो दुहा वह निर्मल दुग्ध बनकर मन को परमेश्वर तत्व की ओर मोड़ता है।
महाराजजी साक्षात हनुमानजी के रूप में विराट बिंब में विराजमान रहे। जो देख पाया वो देख पाया। जो नहीं देख पाया वह तर्क, कुतर्क, विमर्श, बुद्धि, विद्या, परंपरा, रूढ़ी में फंसा रह गया। चमत्कार को नमस्कार करने की वृत्ति यह मानने नहीं देती कि कोई साधारण देह में हनुमानजी हो सकते हैं।
तुलसीदासजी को राम से मिलवाने वाले हनुमानजी किस रूप में मिले थे, यह सारी कथा हम सुनते, समझते, कहते हैं, लेकिन यह पानी को मुंडी पर से उड़ेल देने जैसा होता है। हम उस जल को महसूस नहीं कर पाते। बस सुना है, किंतु माना नहीं है। हनुमानजी परमहंस श्रीराम बाबाजी की देह में विराजमान रहे। इस तथ्य को जानने के लिए उनकी उन क्रियाओं को गौर से सोचिए जब राम की चर्चा हो तो वे प्रकट हो जाते थे। किंतु ध्यान रखिए कभी यह प्रयोग हमने किया हो तो कतई प्रकट नहीं होते थे। जितनी निर्मल चर्चा उतने प्रकट हनुमानजी। चूंकि यह कोई दो और दो चार का फॉर्मूला नहीं है। परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी कहा भी करते थे, देख रहे हो। देख रहे हो मतलब परख रहे हो। परख अपने आपमें अविश्वास है। अविश्वास से ईश्वर कैसे प्रकट हो सकता है। निरंतर मन को यकीन दिलाओ तो वे साक्षात स्वरूप में भी प्रकट हो सकते हैं। परमतत्व का बिंब तब दिखेगा जब भक्ति का विराट सूरज हो और हमारी उसके तेज को देखने की क्षमता हो। यह क्षमता भी गुरु ही दे सकता है।
(आलेख-6 में पढ़िए विधाता का संवाद)
- आलेख-1 ईश्वर की परिभाषा
- आलेख-2 ईश्वर तत्व
- आलेख-3 ईश्वरीय योग
- आलेख-4 परमतत्व की साधना
- आलेख-5 परमेश्वर का जीवंत बिंब
- आलेख-6 विधाता का संवाद
- आलेख-7 विधात्री क्रियाएं
- आलेख-8 अवतार योग
- आलेख-9 आख्यानों में दर्ज गुरु तत्व
- आलेख-10 गुरु में ईश्वर का दर्शन
- आलेख-11 बिंब से प्रकट चैतन्य दृश्यमान प्राकट्य



