ParamhansShrirambabajee: परमतत्व की साधना में आग्रह की मिलावट नहीं होना चाहिए, तभी ईश्वर प्रकट होगा

बरुण सखाजी श्रीवास्तव

साधना औरउपासना दिखाई भी देती हैं और नहीं भी दिखाई देती। हमने इतिहास में अनेक महापुरुषों के के आंतरिक संकल्पों के बारे में पढ़ा है। इसका अर्थ है ऐसे संकल्प जो एक प्रकार से साधना बन गए। फिर हम देखते हैं सनातन संस्कृति में विविध उपासनाएं हैं। उपासनाएं मतलब ईश्वरीय चिंतन के ऐसे मार्ग जिनके अपने रूप हैं। आसन का अर्थ है विश्वास। उपासन का अर्थ है विश्वास की ओर। जैसे हम सोचें कि हमे दिल्ली जाना है, तो सिर्फ सोचने से नहीं पहुंचेंगे। लेकिन हम नहीं पहुंचेंगे तो इसका अर्थ यह नहीं कि दिल्ली नहीं है। न इसका यह अर्थ यह है कि दिल्ली के लिए रास्ता नहीं हैं। आसन का अर्थ है यह मानना कि दिल्ली है। उपासन का अर्थ है उसके रास्ते पर चल निकलना। इस यकीन के साथ कि यह रास्ता वहीं जाएगा जहां दिल्ली है। यकीन ही नहीं बल्कि शोध भी इसमें जब जुड़ जाए तो समझिए साधना भी एकाकार हो गई। साधना और उपासना जब एक होकर आगे बढ़ते हैं तो इन्हें ऊर्जा देता है यकीन। ईश्वर पर पूर्ण विश्वास। आलेख-1, 2, और 3 में क्रमशः ईश्वर की परिभाषा, ईश्वर तत्व और ईश्वरीय योग पर विमर्श हुआ। अब विमर्श परमतत्व की साधना पर होगा।

परमतत्व की साधना से आशय है उसका अता-पता तो मिल गया। रास्ता भी मिल गया। अब चल निकलना है। परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी एक मानव देह से परमतत्व हनुमानजी होने की इस यात्रा में अज्ञात वर्षों से निरंतर रहे। जैसे मैंने ऊपर चर्चा की, हमे दिल्ली जाना है यह पहला पायदान हुआ, हमे दिल्ली का रास्ता तय करना है, कौन सा है यह दूसरा और तीसरा हुआ उस रास्ते को आनंद से आरंभ करना। चौथा हुआ उस रास्ते को तय करने के लिए भीतर का पूर्ण विश्वास लेकर चलते लगना।

साधनाएं टूल हो सकती है, उपासनाएं वैचारिक और भौतिक एनर्जी हो सकती हैं। किंतु असल उड़ान के लिए आंतरिक विश्वास की आवश्यकता होती है। एक बार परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी मंडला से रायपुर की यात्रा में थे। इस बीच मेरे एक मित्र भी साथ में थे। मैंने कह रखा था, भगवान से जितनी चर्चा करना हो कर लेना। मित्र की अनंत जिज्ञासाएं हैं भगवान को लेकर। वे शुरू हो गए। उन्होंने एक जिज्ञासा की, दूसरी की और ज्यों ही जिज्ञासाएं करते गए त्यों ही हनुमानजी ने कहा, नै हम सुने कुई की नै सुनाएं। उसके बाद मित्र मौन हो गए। इस वाक्य का अर्थ हनुमानजी हो जाने की चौथी स्थिति में समझ आता है। परमतत्व की साधना, उपासना पर निकले गहरे विश्वास के साथ की यात्रा आगे बढ़ती है। यह विश्वास निर्मल और निश्छल होना चाहिए। हम जैसे संसारी इसे भी कैल्कुलेट करके करेंगे। मतलब इसमें भी हम विश्वास से ज्यादा आग्रह की मिलावट कर डालेंगे। ज्यों ही आग्रह मिला समझिए विश्वास गया। विश्वास बहुत महीन और झीनी से चीज है। ईश्वर पर ऐसा अटल विश्वास जिसमें आपका आग्रह मिश्रित न हो पाए। तभी सच्ची साधना और तभी सच्ची उपासना हो सकती है। वरना यह सब संसार और परलोक के टूल हो सकते हैं।

अध्यात्म बहुत सूक्षम विषय है। इस विषय को सही ढंग से बनाए रखने के लिए हमे बारंबार अपने मिथक, आग्रहों को तोड़कर चलना होता है। नहीं तो यह भी एक संसारी टूल ही है। परमहंस श्रीराम बाबाजी किसी मिथक, भ्रम, आग्रह को न पकड़कर रखते थे न किसी छवि में कैद होते थे। उनकी परमतत्व की साधना अचल थी। तभी उन्होंने मेरे मित्र को रोक दिया। क्योंकि मित्र आध्यात्मिक जिज्ञासाएं तो रख रहे थे, किंतु महाराजजी क्रियात्मक गुरु हैं, वचनात्मक नहीं। वे अपनी क्रिया से तत्व को समझाते थे, बोलकर नहीं। जो समझ जाए वो समझ जाए, जो न समझे वो न समझे। इसमें भी कोई आग्रह या अभिशाप नहीं। न कोई उपेक्षा, न अपेक्षा। उन्होंने बताया चिरंतर गतिमान रहना ही परमतत्व की संपूर्ण साधना है। उन्हें इसलिए पक्के तौर पर, बिना दुविधा, असमंजस के हनुमानजी मान लेना सही होगा।

(आलेख-5 में पढ़िए परमेश्वर का जीवंत बिंब)

  • आलेख-1 ईश्वर की परिभाषा
  • आलेख-2 ईश्वर तत्व
  • आलेख-3 ईश्वरीय योग
  • आलेख-4 परमतत्व की साधना
  • आलेख-5 परमेश्वर का जीवंत बिंब
  • आलेख-6 विधाता का संवाद
  • आलेख-7 विधात्री क्रियाएं
  • आलेख-8 अवतार योग
  • आलेख-9 आख्यानों में दर्ज गुरु तत्व
  • आलेख-10 गुरु में ईश्वर का दर्शन
  • आलेख-11 बिंब से प्रकट चैतन्य दृश्यमान प्राकट्य

Shrirambabajee.com

shrirambabajee@gmail.com
shrirambabajee@gmail.com
Articles: 57