ParamhansShrirambabajee: ईश्वर तत्व को समझने के लिए आवश्यक है लौ का सतत लगा रहना

परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी श्रृंखलाः आलेख-2

बरुण सखाजी श्रीवास्तव

परमहंस गुरुवर हनुमानजी ईश्वर तत्व की बहुत व्यापक व्याख्या करते हैं। वे कहते हैं लौ लगाने से ही ईश्वर तत्व का अनुभव हो सकता है। संसारी स्वार्थों से ईश्वर तत्व की ओर बढ़ना संभव नहीं है। यह तो सूर्य का परम प्रकाश है। जैसे हम रातभर के अंधेरे से सुबह जब खिड़की से झांककर देखते हैं तो सूरज का जरा सा प्रकाश हमारे कमरे को रोशनी से भर देता है। यहां तक कि हमे दिन के उजाले में अगर रात जैसा अंधेरा चाहिए तो डार्क रूम बनाने के लिए अलग से इंतजाम करने पड़ेंगे। ऐसे ही ईश्वर की ओर बढ़ते कदम हमे अपने भीतर प्रकाशित होने जैसा अहसास करवाते हैं। किंतु यह अहसास ईश्वर तत्व की ओर बढ़ने का है, न कि पा लेने का या देख लेने का या अनुभूत कर लेने का। इसलिए ईश्वर तत्व की ओर बढ़ने के लिए चाहिए हम अपने समस्त संसारी मंतव्यों को पहले उपचारित करें।

हमने गुरुवर परमहंस श्रीराम बाबाजी के मूल दर्शन में पाया है, जो संसारी किसी भी वस्तु, भाव या अपेक्षा में नहीं पड़ता, वही ईश्वर तत्व की ओर बढ़ा है। सनातन संस्कारों में अनेक साधू, संत, महात्मा, बाबा, वैरागी, त्यागी, तपस्वी होते हैं। क्रियाएं और प्रतिक्रियाओं में गोते लगाते रहते हैं, किंतु हनुमानजी हो जाने तक की यात्रा अति कठिन है। पल-पल परीक्षाओं, कांटों, बाधाओं, आकर्षण से जूझना है। इसलिए लौ लगाने का सिद्धांत इस दिशा में बहुत कारगर है। लौ लगाने का अर्थ ऑडिट, रिव्यू, कैल्कुलेशन से मुक्त हो जाना है। गुरु से लौ लगा ली अब तो बस उसके हो जाना है। पल-पल उसी चिंतन में रमना है। भीतर ही भीतर रहना है। जो बाहर है वह सिर्फ शरीर और उसके गुण-अवगुण हैं, भीतर विराजमान विराट ब्रह्म ही है।

ईश्वर तत्व के लिए यात्रा की शुरुआत समर्पण से होती है। सब उस पर छोड़ देना। सब उसका कर देना। परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी कहा करते थे, हानि-लाभ, जीवन-मरण, जस-अपजस विधि हाथ। यानी नो कैल्कुलेशन, नो ऑडिट, नो रिव्यू। जो है वह सब उसका है। दिया भी उसका लिया भी उसका। दिया भी उसका लौ भी उसकी। मैं भी उसका। वो भी मेरा। समस्त वह और वह में ही समस्त। आंखें बंद करके इस लौ को महसूस करने के लिए प्रेरित करता वांग्मय ईश्वर तत्व की ओर ले जाता है।

अपनी यात्राओं में परमहंस गुरुवर श्रीराम बाबाजी हनुमानजी अच्छा करने की प्रेरणा देते थे। अच्छा करने से पूर्व असमंजस से मुक्ति की सीख रहती थी। असमंजस आया कि करना दूषित हुआ। हालांकि फिर भी करना छोड़ना नहीं चाहिए। जैसे निर्मल जल की बहती नदियों में अचानक से कोई नाला आ गिरे। वह उस वक्त तो पानी में मिलता हुआ अलग प्रतीत होगा। कुछ दूरी तक निर्मलता को प्रभावित करेगा, लेकिन जल्द ही वह स्वय की गंदा जल नदी के जल में घुलकर स्वयं ही निर्मल हो जाता है। अर्थात अच्छा करते रहो, ईश्वर तत्व की ओर बढ़ते रहो। बीच-बीच की तमाम परीक्षाएं ही गंदे नाले के रूप में मन, मस्तिष्क पर प्रभाव डालेंगी। कभी लोभ के वशीभूत, कभी अपेक्षा के दास बनकर आपको नचाने का प्रयास करेंगी। जब-जब ऐसा करें तब-तब ईश्वर तत्व को महसूस करो। परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी को महसूस करो, निर्मलता बढ़ती जाएगी।

अनेक बार जीवन में ऐसे अवसर आते हैं जब हम दोषों, विकारों के निरंतर हमलों से निराश होने लगते हैं। ऐसा लगता है जैसे हम बड़े अधम हैं, किंतु यही अवस्था लौ के छोटे से प्रकाश से बढ़कर विराट प्रकाश की ओर लेकर जाती है। बड़ा, व्यापक, विराट प्रकाश समूचे जीवन दायरे में फैल जाता है। यहीं से ईश्वर तत्व की समझ, सोच, विचार, विमर्श, विश्वास की शुरुआत होती है।

एक साधारण देह में विराजमान परमतत्व का अंश आत्मा का प्रकाश 11 पायदानों से होकर होता है। पहले पायदान में ईश्वर की समझ, कथा, कल्पना, आरंभिक विचार, परिभाषा तक पहुंचते हैं। इस दूसरे कदम में ईश्वर तत्व की समझ, सोच, विचार, अनुभव का क्रम है। अगले आलेख में ईश्वरीय योग की बात की जाएगी। ईश्वरीय योग हनुमानजी हो जाने तक लेकर जाता है।

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