परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी श्रृंखलाः आलेख-1
बरुण सखाजी श्रीवास्तव
परमहंस गुरुवर श्रीराम बाबाजी हनुमानजी के ही दिव्य स्वरूप हैं। इस बात को मानने से पहले कहने, सुनने और समझने की यात्रा करनी होगी। यह यात्रा जटिल, कठिन, घुमावदार और गहराई से खुद को धोने की है। हम इस यात्रा पर चलना चाहें तो परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी कैसे हनुमानजी हैं श्रृंखला के सभी ग्यारह आलेखों को पढ़ना होगा। श्रृंखला का यह पहला आलेख है। इस बात को लिखने के लिए 11 हिस्से इसलिए किए जा रहे हैं, ताकि इकट्ठा पढ़ने की बजाए एक-एक करके पढ़ें, सोचें, समझें और जिनके भी हृदय में घुल पाए वह घुल जाए।
अतिश्योक्ति जैसा लगता यह तथ्य हमे तभी तक अतिश्योक्ति लगेगा जब तक कि हमारी भीतरी शुद्धि नहीं हो पाई है। भीतरी शुद्धि की क्रिया इतनी आसान नहीं जो एक जन्म में हो जाए, एक जीवन में हो जाए, एक बार में हो जाए, एक क्रिया में हो जाए। इसके लिए गुरु की परमकृपा चाहिए। गुरु की परमकृपा इस काम को एक सेकंड के करोड़वें हिस्से में भी कर सकती है, किंतु बिना कृपा यह अनंतकाल तक खिंच सकती है।
पंचभूत की देह को हनुमानजी मानने तक की यात्रा रोमांचक, रोचक और आत्ममोचक है। परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी हैं, यह मानने से पूर्व ईश्वर की परिभाषा, ईश्वर तत्व, ईश्वरीय योग, परमतत्व की साधना, परमेश्वर का जीवंत बिंब, विधाता का संवाद, विधात्री क्रियाएं, अवतार योग, आख्यानों में दर्ज गुरु तत्व, गुरु में ईश्वर का दर्शन, बिंब से प्रकट चैतन्य दृश्यमान प्राकट्य तक की यात्रा पर चलना होगा।
आलेख-1 ईश्वर की परिभाषा
आलेख-2 ईश्वर तत्व
आलेख-3 ईश्वरीय योग
आलेख-4 परमतत्व की साधना
आलेख-5 परमेश्वर का जीवंत बिंब
आलेख-6 विधाता का संवाद
आलेख-7 विधात्री क्रियाएं
आलेख-8 अवतार योग
आलेख-9 आख्यानों में दर्ज गुरु तत्व
आलेख-10 गुरु में ईश्वर का दर्शन
आलेख-11 बिंब से प्रकट चैतन्य दृश्यमान प्राकट्य
सबसे पहले ईश्वर की हमारी मौलिक, भौतिक और आख्यानों में दर्ज समझ को समझना होगा। यानि ईश्वर की परिभाषा को जानना होगा। हमारे शास्त्र कहते हैं हर घट में भगवान हैं। यह तो हम बचपन से सुनते आए हैं। जब घट-घट में भगवान हैं तो हम और आप में क्यों नहीं। ये ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर सबसे पहले जरूरी हैं। घट-घट में ईश्वर का अर्थ है जैसे हर बीज में जीवन होता है, लेकिन सारे बीज फल तक की यात्रा नहीं कर पाते। घट-घट में राम का अर्थ यही है। हमारे घट में या प्राण में या हृदय में भी राम हैं। किंतु हम उनकी न सुनते हैं न समझते हैं न मिलते हैं न हम उनके बारे में सोचते हैं। तब घट-घट में राम तो हैं, किंतु जागृत नहीं हैं। प्रकट नहीं हैं।
ईश्वर की परिभाषा ही यह है कि वह हम सबमें है। सब प्राणों में है। सब कणों में है। वह परम-अणु में हैं। वह सर्वत्र है। वह कण-कण में है। वह घट-घट में है। जब इस बात को ठोस ढंग से हम मान लेंगे तब दूसरे पायदान की तरफ चल पाएंगे। चूंकि मूलतः हम ईश्वर के ही अंश हैं। यानि हमारे भीतर राम हैं ऐसे ही परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी के भीतर स्वयं राम विराज में हैं। उनकी नाभि जिन्होंन भी गौर से देखी हो या महसूस की हो तो वे समझ सकते हैं। वे निरंतर राम-राम जपते थे। बाहर चलती बातें हमें बाहर सुनाई दी, अंदर तो सिर्फ राम ही रहा। नाभि में हल्का सा स्पंदन सदा बना रहता था। ज्यों महायोगी सांस लेते हैं। ज्यों महायोगी योग करते हैं। ज्यों हिमालय के साधू हजारों वर्ष तक आकाशीय स्वरूप में रहते हैं। ज्यों अनंत तक अनुभव होने वाले हनुमानजी उनके स्वरूप में विराजते हैं। ज्यों वे स्वयं हनुमानजी बनकर एक देह में समा जाते हैं। ज्यों वे सतत रामदास बनकर उनकी आज्ञा पर चलते हैं।
(आलेख-2 में पढ़िए ईश्वर तत्व क्या है?)



