Paramhans_Shrirambabajee: भक्ति का रस जो चखे वह भीतर ही स्वाद रखे

बरुण सखाजी श्रीवास्तव

अध्यात्म या दर्शन का भाव जैसे-जैसे गहरा होता जाता है वैसे-वैसे हमारी अभिव्यक्ति बढ़ती जाती है। यही काम आयु के साथ भी होता है। हम जितने बूढ़े, बड़े होते जाते हैं उतने ही अनुभव बयान करने लगते हैं। जीवन के अपने अनुभव साझा करना अच्छी बात है। इससे संसार को अनुभवों का फायदा मिलता है, लेकिन अध्यात्म की दुनिया में इनका साझा करना नुकसानदेह है। अध्यात्म और दर्शन का क्षेत्र मौन, भीतर बैठकर आनंद में रहने का क्षेत्र है। जितना ज्यादा बोलेंगे, लिखेंगे, कहेंगे, सुनेेंगे और सुनाएंगे उतने ज्यादा रीतते जाएंगे। रीता हुआ आदमी अध्यात्म में गहरे नहीं उतर पाता। रीता हुआ आदमी घी के खाली डिब्बे के समान हो जाता है, जिसमें घी की सुगंध तो रह जाती है, लेकिन घी नहीं। अध्यात्म और दर्शन ऐसा हलवा है हर चम्मच पर नया स्वाद देता है। ऐसा स्वाद कि हम वाह कहे बिना रह नहीं सकते। हर चम्मच जुबान पर रखते ही ऐसा लगता है क्या कहें, बनाने वाले की तारीफ करें या देने वाले की तारीफ करें या फिर पास में बैठे व्यक्ति को भी इसका स्वाद चखाएं। बस कुछ भी करें अपने भीतर के आनंद को बताएं।

यह लगता तो आनंदप्रद है। और जब आनंद चरम पर होता है तो हमे यह और आनंददायक लगने लगता है। इसी गति में हमारा रीतना यानी खाली होना और बढ़ जाता है। इस खालीपन से ही शुरू होती है हमारे खत्म होने की कहानी। सार यह है कि गुरु और शिक्षक में जमीन-आसमान का फर्क है। शिक्षक वही सिखाता है जो उसने सीखा होता है। गुरु वह सिखाता है जो हमे सीखना जरूरी होता है।परमहंस श्रीराम बाबाजी अपने भीतर के आनंद को किसी से कहते नहीं थे। न कहते थे न किसी को अनुभूत होने देते थे। यहां तक कि भक्तिरस का सबसे बड़ा परिचायक आंसुओं का झरना भी छिपा लेते थे। ईश्वर की स्मृति में आंसुओं का बहना बहुत आम है। लेकिन इस अभिव्यक्ति में भी हमारा खाली होना आरंभ रहता है। भक्ति का आनंद, ईश्वर का आनंद वैसा ही होना चाहिए जैसे गूंगा स्वादिष्ट खाए और सिवाय चेहरे के हावभाव के अलावा कुछ भी प्रकट न कर पाए। इनफैक्ट प्रकट कर भी नहीं सकता। जो प्रकट कर रहा है या तो वह परमभक्त तुलसीदास है या फिर भक्ति-भ्रम में जीता हुआ कोई भगत।भ्रम का क्रम भक्ति में डूबते जाने के साथ ही और बढ़ता जाता है।

चखा स्वाद दूसरों को चखाने की कोशिश के रूप में आता जरूर है लेकिन यह महत्वाकांक्षा का दानव साथ में लाता है। इसलिए ही हमारे ग्रंथों में ईश्वरानुभूति को अप्रकट रखने की सलाह दी गई है। हर जगह कहा गया है अनुभूत को भीतर रखो। बाहर आते ही यह उड़ जाती है। परमहंस गुरुवर हनुमानजी श्रीराम बाबाजी इस बात पर अडिग रहे। आंसू का झरना उनके भीतर रिस रहे भक्ति के परम रस के सामने बहुत बौना है। वे भीतर बैठे-बैठे चैतन्य हनुमानजी के रूप में एक भौतिक देह में नजर आते रहे। हम देह देखते रहे, भीतर बैठे चैतन्य कपिध्वज को कम ही लोग देख पाए। इसलिए लिए ही परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी ने भीतर की कहानियों का प्रकटन सर्वथा वर्जित रखा था। अगर कोई कुरेदता भी तो वे बाहरी किस्सा सुनाकर अंदर स्वयं उतर जाते थे। कभी किसी को अपनी महिमा, तप, ज्ञान, वैराग्य, ईश्वरत्व की यात्रा के बारे में नहीं बताया। परमहंस श्रीराम बाबाजी के इस अंश तक संसारी कपट रूप में कैसे पहुंच पाता। यहां तक पहुंचने के लिए जिस परिशुद्धि की जरूरत थी वह तो अत्यंत दुर्लभ रही।

(अगले भाग में पढ़िए भक्ति भावनाओं का ज्वार सिर्फ नहीं)

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