राम नाम की अनुभूति है, दिव्य जहां हनुमान।
ऐसे निज धाम में, बैठे हैं गुरु भगवान।।
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परमहंस हनुमानजी, देख रहे सब मौन।
छन्ना-छन्ना पारकर, आए कितने कौन।।
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परमहंस श्रीराम बाबाजी, कृपा आपकी होए।
सबके मन मुस्कान है, खोज सके जो कोए।।
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सबसे ऊपर भगत शिरोमणि, नीचे-पीछे सब दास।
जय-जय होए श्रीराम की, ऐसो बसे गुरु को वास।।
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छन्ना-छन्ना लगत रहा, छोड़ा कासीवास।
पांव-पांव भगत भगे, आन विराजे रेवा पास।।
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परमहंस की परम गति, जान जाए जो कोई जो हाल।
पाखंड, पंडा दूर रहे, जब भगत स्वयं भए कोतवाल।।
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अन्तर्मन कीर्तन चले, आंखें मूँदें राम।
अचल, अनन्त दिव्य है रेवा तेरा धाम।।
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पद न पादुका, वेद न वाद, चलता चल हनुमान।
जाघर-बाघर ठहर कर, दरस दियो भगवान।।
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औघड़ क्रिया, वैष्णव वेश, रूप भलो संन्यासी को।
करत कीर्तन राम को, घट-घट के वासी को।।
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पंचसीख हनुमान की, जान सके सो जान।
कीर्तन, भंडारा, यात्रा, परहित और दान।।
@Barun Sakhajee Shrivastav



