बरुण सखाजी श्रीवास्तव

अद्वैतः आध्यात्मिक क्रम में अद्वैत की व्याख्या जितनी आसान है उतनी ही कठिन है इसकी अभिव्यक्ति और सबसे ज्यादा कठिन है इसकी अनुपालना। अद्वैत कहने में दूसरा कोई नहीं। सर्वोच्च और एकम ईश्वर। एकम ईश्वर तो इतने सारे ईश्वर क्यों, इतनी पूजाएं क्यों, इतने मंदिर क्यों, इतने धर्म क्यों, इतने पंथ क्यों, इतने दैव क्यों, इतने सिद्धांत क्यों, इतने रास्ते क्यों, इतने पूज्य क्यों, इतना भ्रम क्यों?
भ्रम भीतर नहीं बाहर है, भीतर तो एक ही ईश्वर है। चैतन्य रूप में परमहंस श्रीराम बाबाजी, दिव्य रूप में परमहंस श्रीराम बाबाजी, तत्व रूप में परमहंस श्रीराम बाबाजी, हनुमानजी रूप में परमहंस श्रीराम बाबाजी।
कैसे देखें अद्वैत तो एक ही तरीका, शरणागति परमहंस श्रीराम बाबाजी की। वही देव, वही गुरु, वही देवी, वही मां, वही पिता, वही मैं, वही समाज, वही भक्त, वही ईश्वर, वही नर्मदा, वही भगवती, वही ब्रह्म, वही सत्य, वही सब, वही एक अतः अद्वैत।


