
बरुण सखाजी श्रीवास्तव
रुद्रावतार हनुमानजी यानि परमतत्व राम के महाभक्त, अनंत शक्तिमान, शून्य अभिमान, राम किंकर, रामाज्ञयी, राममय, अनंत आकाश, अप्रमाणेय, विराट, सर्वतत्व, चिरअवतारी। जिन चित्रों में हनुमानजी को हम चित्र स्वरूप देखते हैं, जिन कथाओं में उनके स्वरूप को अनुभूत करते हैं, जिन श्रुतियों में उन्हें सुनते हैं, जिन परंपराओं में उन्हें प्रकट देखते हैं वे ही हनुमानजी परमहंस श्रीराम बाबाजी के रूप में हमारे बीच सशरीर विराजे रहे। चैतन्य हनुमानजी के रूप में वे प्रकट स्वरूप में रहे। हम निर्भूत में ईश्वर को देखने के प्रयास करते हैं, किंतु देखने के लिए बड़ी साधना और संधान लगते हैं, जबकि प्रकट में हम उन्हीं चैतन्य को देख तो रहे होते हैं, किंतु मन फिर भी चित्र, विचित्रों में उलझा रहता है। यही उलझन हमे तत्व हनुमानजी तक ले जाने में बाधक बनती है। चैतन्य हनुमानजी ने प्रकट होकर उस तत्व तक ले जाने का मार्ग प्रशस्त किया।
चित्रों के स्वरूप में हमे सहजता मिलती है। महाराजजी कहते थे चैतन्य ही ईश्वर है। पथरों में मूड़ मार रै… कहकर भी समझाने का संकेत करते थे। इसका वास्तविक अर्थ वे ही जानते हैं, किंतु इसे समझने का प्रयास करते हैं तो यही समझ आता है कि चैतन्य के प्रति हमारा नजरिया, कर्म, क्रिया वैसी ही होनी चाहिए जैसी चित्र में लिखे ब्रह्म के लिए होती है। हमारा सनातन विचार भी यही कहता है। हर घट में राम विराजे, हर जीव में राम विराजे। हर घट में राम से आशय चैतन्य में ईश्वर को देखना है। देखते हुए अनुभूत करना है। अंदर की आंखों से देखना है। इसलिए परमहंस श्रीराम बाबाजी बार-बार कहते भी थे, बाहर की बंद करो अंदर की खोलो।
चैतन्य की पूजा, घट-घट की पूजा और बाह्य भौतिकी पूजाओं में कोई अंतर नहीं, किंतु भाव एक समान होना चाहिए। महाभक्त तुलसीदासजी अपने रामचरित मानस में अनुभूत करते हैं, जब मनु-सतरूपा को राघव के दिव्य दर्शन हुए तो उन्हें क्या दिखा। कभी उन्हें उनके चरण दिखते, कभी उनका दिव्य स्वरूप दिखता, कभी वे रघुनाथ संबोधित करते, कभी ब्रह्म। चूंकि जिस कालखंड में मनु महाराज दर्शन कर रहे थे तब राम का अवतार नहीं हुआ था, फिर भी उन्हें राम ही दिखे। परमभक्त तुलसीदासजी ने बताया है दशरथ नंदन राम और अनंत राम एक ही हैं। वे ही यहां आए सगुण होकर। वे ही वहां थे निर्गुण होकर। वे ही प्रकट हुए राम रूप सगुण होकर। यानि सगुण में दिख रहे देव को निर्गुण भाव से और निर्गुण में दिख रहे देव को सगुण भाव से देखना चाहिए। और सरल करते हैं तो सगुण भाव जो ऐंद्रिय माध्यमों से प्रकट हो निर्गुण भाव जो भीतर से महसूस हो। जब भीतर से महसूस करके चैतन्य को देखेंगे तो वह ईश्वर बन जाएगा और जब आप सगुण ऐंद्रिय भाव से भीतर विराजे निर्गुण को देखेंगे तो वह चैतन्य ईश्वर हो जाएगा। बस महाराजजी का मूल दर्शन यही था।
भाव ज्यों ही प्रकट में आता है, वह बाह्य तत्वों से प्रभावित होकर भीतर के भाव जैसा मृणमयी और निर्मल नहीं रह पाता। इसका शोधन गुरु ही कर सकता है। भीतर बैठे गुरु का प्रकाश तब आएगा जब बाहर बैठे गुरु द्वारा शोधन होगा। बाहर बैठकर भी गुरुवर हनुमानजी श्रीराम बाबाजी ने यह शोधन अलग-अलग अवसरों और क्रियाओं के जरिए किया है। अब भीतर बैठे गुरु स्वरूप में हनुमानजी श्रीराम बाबाजी अप्रकट में शोधन कर रहे हैं।
भूत, भौतिकी के दास इस संसार में ऐंद्रिय रूप से परमतत्व को देखने की हमारी चेष्टा इसे अप्रकट में खोजती तो है किंतु पा नहीं पाती। कारण परंपराएं, आग्रह, हमारी अपनी वैचारिकी बनावट, हमारा सोचने का ढंग, परमतत्व से जुड़ी अवधारणाएं इसमें बड़ा पर्दा बनती हैं। इस पर्दे को हटाने के लिए भाव, मन, विचारों में बड़ा शोधन आवश्यक है। तपस्थ मुनियों की वर्षों, जन्मों की तपस्या भी कई बार इस शोध को प्राप्त नहीं हो पाती। यह हमारा भाग्य नहीं परमभाग्य है जो हमने चैतन्य हनुमानजी को निर्बाध अनुभूत किया है। हममे से कुछ ने देखने के साथ दर्शन किए हैं और हममे से कुछ ने दर्शन के साथ ब्रह्ममय अनुभूत किया है, हममे से कुछ ने उन्हें तत्व में जाना है। जिन्होंने तत्व में जाना उन्होंने फिर किसी और में भी जाना और माना, लेकिन जिन्होंने न तत्व में जाना न किसी और में भी माना या जाना वे चित्रों, विचित्रों, ठिया और ठिकानों में हैं।
हनुमानजी के समरूप में चैतन्य हम सबके बीच रहकर भी अप्रकट भ्रमण श्रीराम बाबाजी की इसी क्रिया का एक हिस्सा था। जब उन्हें चैतन्य हनुमानजी कहा जाता तो वे उसी स्वरूप में प्रकट होते। कहते भी थे, देख रहे हो या दर्शन कर रहे हो। बहुत समय तक उनसे जुड़े लोग उन्हें कौतुहल से देखते रहे। लगता रहा बाबा हैं तो अलग। जब हमने सोचना शुरू किया कि बाबा हैं तो अलग बस यहीं से हमारे आग्रह ने उन्हें मूर्ति, चित्र, विचित्र में विराजे हनुमान से अलग सा जान लिया। जबकि सत्य में वे ही हनुमानजी हैं वे ही मूर्ति हैं, वे ही चित्र हैं, वे ही कथा हैं, वे ही श्रुतियां हैं, वे ही आप और हम हैं, वे ही हमारे भीतर के आग्रह हैं, वे ही हमारे बड़े और छोटे भगत की परिभाषाएं हैं, वे ही हमारे प्रदर्शन हैं, वे ही हमारे अंतर्दर्शन हैं, वे ही समस्त हैं, वे ही चैतन्य हनुमानजी हैं और वे ही कण-कण में व्याप्त ब्रह्म हैं। इसलिए कहना चाहिए चैतन्य ही ईश्वर है, सिर्फ एक वाक्य नहीं भीतर का अहसास है।
shrirambabajee.com



