बरुण सखाजी श्रीवास्तव
अनुकूलता ही सुख है और प्रतिकूलता दुख। दुख और सुख अगर दुनिया में होते तो वे सबके लिए एक समान होते। जब एक दुखी होता तो सभी दुखी होते और एक सुखी होता तो सभी सुखी होते। यह हमारी बाहर की नहीं बल्कि भीतर की स्थिति है। अपने लिए अनुकूलता खोजते हुए हमारा मन दुखी और सुखी होता रहता है। इसीलिए परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी कभी अनुकूलता और प्रतिकूलता में नहीं पड़े। वे अपनी मस्ती में रहे।

मन की मानी हो तो सुख, मन की मानी न हो तो दुख। सारा खेल मन का ही तो है। हम जो चाहते हैं वैसी ही हो जाए तो दुख क्यों हो। मनोविज्ञान की भाषा में दुख असहजता है। सुख सहजता है। हम इस अनुकूल और प्रतिकूल के चक्र में ज्यादा पड़ जाते हैं। जरा सा भी प्रतिकूल हुआ तो कष्ट होता है। इसे नवयुगीन कॉर्पोरेट भाषा में कंफर्ट जोन भी कहते हैं। ऐसा क्षेत्र जहां हम सुलभ हैं। किंतु ये सुलभता हमारा बंधन है। हमारी राह का रोड़ा है। परमहंस श्रीराम बाबाजी इसकी बेड़ियां निरंतर तोड़ते रहते थे। यहां तक कि देह त्याग के दौरान हुए शारीरिक कष्ट के वो 72 दिन भी वे सतत प्रतिकूलता को चुनते रहे। उन्होंने अनुकूलता को कभी अपनी मजबूरी नहीं बनाया। महाराजजी बनारस जा पहुंचे थे। हर जगह से उनके भक्त वहां पहुंच रहे थे। इनमें एक मैं भी था। अगस्त की चिपचिपी गर्मी थी। गंगा के तट के पास धर्मसंघ में भगवान विराजमान थे। सभी ने एसी में शिफ्ट करने की प्रार्थना की, किंतु महाराजजी ने न तो एसी में शिफ्टिंग को लेकर हां बोले, न ही अन्य किसी भी तरह की अनुकूलता के लिए उनकी हां थी। यह उस समय की बात है जब वे शारीरिक कष्ट का सामना कर रहे थे। इसी तरह तब हुआ जब सभी ने प्रयास और प्रार्थना की कि भगवन आप जहां बौरास में विश्राम करना चाहते हैं वहां एसी लगवा लेते हैं, ताकि थोड़ा आराम हो जाए। भक्त इसलिए ज्यादा प्रार्थना कर रहे थे, क्योंकि महाराजजी जब-जब अस्पताल गए तब वे थोड़े कष्टमुक्त रहे। यहां तक कि उन्होंने आरामदायक एडजस्टेबल बैड पर विश्राम से भी इनकार कर दिया। उनकी इस क्रिया को उस वक्त समझा नहीं जा सका, लेकिन बाद में समझ में आया यह सब अनुकूलता और प्रतिकूलता का ही मसला था। वे किसी तरह के भी सुख, दुख से परे होकर चिदानंद को पा चुके थे।
मन चाहे तो राजा बना दे मन चाहे तो रंक। मन को काबू करना, मन को शोधित करना, मन को समझना ही तो सारा विज्ञान है। इसके लिए ही तो संसारभर के दर्शनों का आविष्कार हुआ है। परमहंस श्रीराम बाबाजी कहते थे भजन करो। भजन एक विधान है। यह अनुकूलता और प्रतिकूलता के बीच के फर्क को खत्म कर देता है। यह इनकी गुलामी को बेअसर कर देता है। जब हम भजन के चरम पर होते हैं तो चिदानंद की ओर होते हैं, क्षणिक, संसारी सुख, अनुकूलता, सहजता या दुख, प्रतिकूलता, असहजता में नहीं होते। हर तरह से, हर हालत में स्थायी, यही चिदानंद है।



