महेंद्र शर्मा, गंजबासोदा
समर्पण
आज से लगभग 40-50 वर्ष पूर्व गुरुदेव भगवान दादाजी श्रीराम बाबाजी महाराज की मेरे ऊपर कृपा हुई। मुझे शरण में लिया। उन्होंने मुझे पहला उपदेश “सत्य बोलो, पूरा तौलो, फिर मन चाहे जहां डोलो, बाहर की बंद करो, भीतर की खोलो” का दिया था।
मैं उस समय नौकरी के साथ परिजनों के सहयोग से दुकान भी करता था। पिताजी ने भी दुकानदारी चलाई थी। अतः उन्होंने भी दुकानदारी चलाने के गुण बताए थे। इनमें पूरा तौलने की शिक्षा दी। पूरा ही तौला जाता था। मैंने उस मंत्र की यही व्याख्या की। आगे फिर सत्य बोलने का प्रयास किया। परन्तु परिस्थितियां भ्रम पैदा करती रहीं।
फिर मैंने इस महामंत्र का पालन पीछे से शुरू किया, यानि भीतर की खोलो को समझना शुरू किया। धीरे-धीरे अभ्यास शुरू किया। बुराइयों को त्याग कर अच्छाइयां देखने का प्रयास किया। अच्छे बुरे जैसे भी कर्म करता, आत्मा के साथ गुरु चरणों में समर्पित करने लगा।

स्वयं को गुरु चरणों में समर्पित कर प्रार्थना करता, हे गुरुदेव भगवान मैं कुछ नहीं हूं जो हैं आप ही हैं। अच्छा-बुरा, झूठ-सच, मैं कुछ भी नहीं जानता। सब आप ही हैं। जो कराते हैं मैं करता चला जाता हूं, जो बुलवाते हो मैं बोलता हूं। बस हो गया काम। झूठ बोलने वाली सभी परिस्थितियां स्वतः ही खत्म होती गईं।
गुरुकृपा के मेरे निजी अनुभवों को आप सभी गुरु भाइयों से साझा किया। इसमें सुधार की जो भी आवश्यकता समझें मार्गदर्शन करें। गुरु चरणों की कृपा का आनंद अनुभव करें। इसी आशा के साथ। संत शिरोमणि गुरुदेव भगवान दादाजी श्रीराम बाबाजी महाराज की जय।
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(आलेख परमहंस श्रीराम बाबाजी के परम कृपापात्र श्री महेंद्र शर्माजी, जिला विदिशा गंजबासोदा मध्यप्रदेश से श्रीराम बाबाजी भक्त मंडल वॉट्सएप ग्रुप में पोस्ट किया है। उनकी अनुमति पूर्वक कृपा से इसे वेबसाइट और फेसबुक पेज पर साझा किया जा रहा है। आंशिक संपादन शामिल है।)



