परमहंस श्रीराम बाबाजी, जिनका न कोई अतिप्रिय न कोई उनसे दूर

बरुण सखाजी श्रीवास्तव

अहंकार की एक ही पहचान है। जब आपको लगे कि आपका अहंकार कम है। आपको लगे, ज्यादा हो रहा है। कभी आपको ऐसा लगे कि है ही नहीं तब समझिए आप अहंकार से भरे पड़े हैं। जब आपको लगता है अहंकार है तो भी आप अहंकार में हैं। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। यह जितनी बार सोचा जाएगा उतनी बार उतनी ही मजबूती से प्रकट होता है। अहंकार को मिटाना असंभव जैसा है, किंतु संभव है। कहने की बातें अलग हैं करने की बहुत अलग। जब कहना और करना एक हो जाता है तो सोचना अलग रह जाता है। जब सोचना, कहना और करना एक हो जाता है तो आम इंसान भी भगवान बन जाता है। सनातन में इसे आत्म-प्रकाश कहा गया है। जैनिज्म इसे निर्वाण, ईसाइयत में सॉलेम कहता है।

सारे मानविकी के इतिहास में अहंकारमुक्त कोई नहीं है सिवाय हनुमानजी के। वे ज्ञानियों में तो अग्रणी हैं, लेकिन मासूमियत में इतने मासूम हैं कि माला में राम खोजते हैं। विभीषण कहते हैं क्या आपके सीने में राम हैं तो वे सीना चीरकर दिखा देते हैं। हनुमानजी ने अंहकार से निपटने के लिए नेचुरलिज्म को प्राथमिकता थी। यानि प्रकृतिवाद। यानी वही जो हो। इसमें कोई करैक्शन या संपादन नहीं। कोई बदलाव नहीं। कोई अनुकूलता या प्रतिकूलता नहीं। जामवंत ने याद दिलाया तुम जा सकते हो तो वे समुद्र पार करने चल पड़े। जब चले तो अहंकार ने उन्हें घेरना चाहा, पर हनुमानजी ने कहा जिमी रघुपति अमोघकर बाना। यानी जैसे राम का अमोघ अस्त्र समुद्र पार कर रहा हो। बाना मतलब बाण भी और बाना मतलब लिबास भी। यानी स्थायी रूप से रामदूत का लिबास। रामचरणानुरागी। यानी बिल्कुल सहज, सरल, जो बनाया था वही अंत तक रहे।

परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी में भी यही भाव और लक्षण प्रकट होते हैं। कार में रखे डलियों से समोसे, झोली में भरे पड़े पांच-पांच सौ के नोटों की भारी-भरकम गड्डियां, किलोमीटर को बिना तौले, नापे दौड़ रही गाड़ियां, किंतु जरा भी ये फिक्र नहीं कि अब क्या होगा, कहां से होगा, कौन देगा, कौन से मांगेंगे, कौन से क्या कहेंगे और न ये कथन कि मैंने कर दिखाया, देखो ऐसे किया, वैसे किया। सहज, सरल, जो हैं वही हैं। जैसे हैं वैसे ही हैं। न किसी के हिसाब से एक तिल बदलना न किसी के हिसाब से एक तिल घटना। परमसत्य को अंतस में बिठाने वाले।

एक यात्रा में कार में पीछे बैठे एक भगत मित्र ने कहा, महाराजजी भक्त की क्या पहचान है? कैसे समझें कि हम में भक्ति है? क्या करें कि दान सुपात्र को जाए इत्यादि। कई सारी जिज्ञासाएं और कई सारे सवाल। एक-दो का जवाब दिया, उसके बाद साफ बोल दिया, नै हम कुई की सुनैं न कुई हे सुनाएं। समझने वाले समझते रहे। परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी ने अपना हनुमत्व प्रकट किया। यानी जो हैं वही हैं, किसी के हिसाब से ऊपर-नीचे नहीं। मन में अनंत के प्रति अगाध प्रेम है। लौ है। लगन है। भक्ति है। लौ नहीं है, लगन नहीं है, भक्ति नहीं, ऐसे किसी उलझाऊ बौद्धिक विमर्श में पड़कर जबरन न समय नष्ट करना न ऊर्जा न भाव में दोष लाना।

अर्थ बहुत साफ था। वे हनुमानजी की तरह स्पष्ट रामाश्रयी जीवन जीते रहे। न किसी को श्राप न किसी को वरदान। न कोई अतिप्रिय न किसी को दूर करने की चेष्टा। वे तो कई बार ऐसे घरों में भी विराजे जहां भक्तों को लगता था शायद उचित सम्मान नहीं मिल रहा। वे जरूर विराजे, क्योंकि वे वहीं उस अहंकार को धता बता रहे थे जो हाड़-मांस को ही चेतना समझने का प्रयास कर रहा था। हम इस बारीक क्रिया और विचार को भांप न पाए। समझ न पाए।

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