बरुण सखाजी श्रीवास्तव
इंसानी दिमाग एक मिनट में हजार से अधिक विचार प्रकट करता है। सनातन विज्ञान के अनुसार चौरासी लाख योनियों में किसी दूसरे शरीरधारी अथवा अशरीरी की इतनी क्षमता नहीं है। लेकिन दिमाग की क्षमता एक बात है इसका इस्तेमाल दूसरी बात। ज्यों एक फोन की मेमोरी कितने ही जीबी हो, मगर हम उसमें रखते क्या हैं, यही हमारी समझदारी है। ऐसे ही हमारे दिमाग की सोचने की क्षमता पर हमारा नियंत्रण जरूरी है। आधुनिक शिक्षा दिमाग को अधिक से अधिक सोचने के लिए प्रेरित करती है, किंतु इसे नियंत्रित करने का इसमें कोई उपाय नहीं है। आधुनिक शिक्षा पद्धति हमारे दिमाग को पैना बनाती है, जो सिर्फ काटने और बांटने के काम का ही रह जाता है। सृजनशीलता विलोपित हो जाती है। फिर हम एक मशीन बन जाते हैं। जैसे कि एक चींटी, केंचुआ, सांप, मिट्टी को उर्बरा बनाने वाले कीड़े या अन्य जानवर। इंसान को इंसान बनाने वाला ही सनातन धर्म है। जो जितना ज्यादा सोचता है वह उतना ज्यादा निराश हो सकता है, ज्यादा जिम्मेदार हो सकता है, ज्यादा दंड का भागीदार होता है। विचारों को रोकना संभव नहीं, किंतु नियंत्रित किया जा सकता है। सोच की इस तेज प्रक्रिया को साधना ही असल में साधना है, योग है, अनुष्ठान है, पूजा, उपासना की विविध पद्धतियां हैं।
परमहंस श्रीराम बाबाजी के जीवनवृत्त में अनियंत्रित विचार को शोधित करने की क्रिया शामिल है। वे अक्सर इस चौपाई को अपने कीर्तन में शामिल करते थे।
बातुल भूत बिबस मतवारे।
ते नहीं बोलहीं बचन बिचारे।।
इसका अर्थ है ऐसे लोग जो उन्माद, प्रेत के अधीन, नशे में चूर हैं वे विचार कर कोई बात नहीं करते। यानी उनकी वैचारिक प्रक्रिया तो चलती है, लेकिन इन पर उनका नियंत्रण नहीं रहता। वे कुछ भी बोल सकते हैं, कुछ भी कह सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं। इस चौपाई में बिना विचारे बोलने से तात्पर्य अनियंत्रित विचारों के प्रवाह से है। जैसा कि मैंने ऊपर कहा, आज की शिक्षा पद्धति हमें खूब सोचने की सीख तो देती है, किंतु इसे नियंत्रित करने की नहीं।
इस तीव्र अनियंत्रित विचार प्रक्रिया को सनातन विज्ञान में कई तरह से नियंत्रित करने के विधान हैं। परमहंस श्रीराम बाबाजी निशंक रहने को इन सब विधानों का सार बताते हैं। जैसे वे अपनी यात्राओं में कोई योजना नहीं बनाते थे। न उनका कोई गंतव्य होता था, न रास्ते का कोई तय आयोजन, न कोई भागमभाग, न कहीं पहुंचने की जल्दी, न कहीं रुकने की आशंका, न चिंता, न रास्ते में कब, कहां, कैसे, क्या होगा की कोई तैयारी, न कोई पुख्ता, ठोस प्लान जिसके हिसाब से वे चलते हों। वे रामश्रयी जीवन के प्रेरक होने के नाते, सिर्फ चल पड़ते थे। आशंकाओं से मुक्त होकर सतत निशंक चलना ही उनके जीवन का सार है। परमंहस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी इसे पुख्ता करने के लिए अक्सर कहा करते थे….
भय नहीं, चिंता नहीं काल की। ये चाल है अंजनी के लाल की।।

यानी कोई आशंका नहीं। कोई उदासी नहीं। कोई अविश्वास नहीं। कोई परमात्मा की योजना में दखल नहीं। परमहंस हनुमानजी श्रीराम बाबाजी के शब्दकोष में अफसोस शब्द ही नहीं था, क्योंकि वे आंतरिक दृढ़ता से मानते थे कि जो परमात्मा की योजना है वही योजना है, इंसान की तो वासनाएं हो सकती हैं। अपनी सहूलियत के लिए गढ़ी, मढ़ी गई इच्छाएं हो सकती हैं। इसलिए चलना उसके हिसाब से है, अपने हिसाब से नहीं। अपना हिसाब अगर रहेगा तो द्वैत पैदा होगा। इसलिए अपने हिसाब को समर्पित मत करो बल्कि खत्म कर दो। जब एक ही हिसाब बचा तो सोचने की जरूरत क्या?
सार कहा जा सकता है, निशंक रहिए। निर्वासनाई अपने आप हो जाएंगे। एक हिसाबी बन जाएंगे तो दूसरे हिसाब से तुलना ही नहीं रह जाएगी तो अच्छा और बुरा कहां रह जाएगा। तब फिर लाभ, हानि ही कहां रह जाएंगे। सब एक हो जाएंगे। तब स्वयं ही ईश्वर हो जाएंगे या ईश्वर ही स्वयं हो जाएंगे। सब एकाकार हो जाएगा। अलग कुछ है ही नहीं तो रहेगा क्या।
परमहंस श्रीराम बाबाजी हनुमानजी के इस परमतत्व और गूढ़ आध्यात्मिक चिंतन को समझना अतीव कठिन है किंतु उनकी कृपा से उतना ही सुलभ भी। यह बुद्धि का काम नहीं, विवेक के बसका नहीं, यह सिर्फ कृपा से संभव है। निर्विचार अवस्था, निशंक अवस्था के लिए ही संसारभर की सारी साधनाएं शोधित की गई हैं। हमारे गुरुवर हनुमानजी एक सरल सी भाषा में इतना गूढ़ रहस्य दे गए।
Shrirambabajee.com



