बरुण सखाजी

परहित बस जिनके मन माहीं, जिनको जग दुर्लभ कछु नाहीं। जिनके हृदय में परहित की भावना है उनके लिए संसार में कोई भी चीज पाना दुर्लभ नहीं है। इसके गूढ़ार्थ को समझना कठिन नहीं है। बहुत ही सरलता से परमहंस श्रीराम बाबाजी कहते हैं, जब आप दूसरों की चिंता करेंगे और सब दूसरों की चिंता करेंगे तो खुद की चिंता अपने आप हो जाएगी। इसी का नाम तो समाज होता है। इसी का नाम तो संसार होता है। खुद की सोचो और खुद में ही घुसे, थमे रहो तो कैसे दुनिया चलेगी। इसलिए दूसरों के हित की सोचो, आनंद में रहो। सारी जरूरतें दूसरों की पूरी करो तो खुद ही अपने आप हो जाएंगी। और अपने ही अपने मन में यह भाव आ जाएगा कि अब जरूरत ही क्या है। जब सब जरूरतें पूरी हो रही हैं तो जरूरत ही क्या है जरूरत की और जरूरत के बारे में सोचने की और जरूरत को जरूरी मानने की। यही तो परमहंस श्रीराम बाबाजी की दिव्य संदेश है।



